मन नगरी में प्रीत-आयशा मुस्तफ़ा

mahakta aanchal story
  • Story Name-Mann Nagri Main Preet
  • Author-Ayesha Mustafa
  • Book/MagazineMahakta Aanchal

सायम! आप घर आ रहे हैं या नहीं?”
आयला गुस्से से बोली।
“उफ्‌ . . . यार! आ रहा हूं । हिटलर मत बनो, बस मैं आधे घंटे में पहुंच रहा हूं”।

“ठीक है, मैं इन्तिज़ार कर रही हूं।”
आयला ने फ़ोन रख दिया। उसे यकीन था
आधे घन्टे बाद सायम आ जाएगा।

उनकी अरेन्‍ज मेरिज थी। आयला की
फुप्फो के जानने वाले लोग थे यह लोग।

फुप्फो के दो बेटे थे जो आयला से छोट थे।
वह आयला को अपनी बेटी ही कहती थीं और इसका सुबूत भी मिल गया था।

छह माह हो गए थे उसकी शादी को ।
सारी सुसराल बहुत अच्छी थी। वैसे भी
सुसराल मे था कौन। बस सास थी ।
सुसर का दो साल पहले इन्तिकाल हो गया था ।

एक नन्द थी सायम से छोटी । वह
अपने ताया के घर ब्याही थी और खुश थी उसकी सास कहती थी वह बहुत खुश किस्मत हैं । बहू और दामाद दोनों अच्छे मिले हैं।

जारा उसकी ननंद का एक ही बेटा था
और उसके शौहर वाकई बहुत अच्छे थे।
उसकी सास और नन्द तो थे ही अच्छे
सायम की तो बात ही क्या थी । उसने अपने बाबा का कारोबार बहुत अच्छी तरह से संभाला हुआ था।

“लीजिए जनाब! आधा घन्टा हो
गया । मैं हाजिर हूं ।” वह किचन में थी जब
सायम पीछे से आकर बोला “अरे आपके आने का तो पता ही नहीं चला।”

सायम हंस दिया- “वैसे यार! सोच
रहा हूं जिस तरह तुम्हारा हुक्म मानता हूं
क्या वाकुई मैं जोरू का गुलाम तो नहीं।”

आयला ने उस बात पर उसे तेज नजरों
से घूरा।

“अच्छा ऐसे मत घूरो । यह बताओ
क्या पकाया है? यार! बहुत ज़ोर की भूक लगी है ।”

“आज आपकी पसन्द की डिश पकाई
है मैंने चिकन कोरमा।”

“वाह! तो बस फटा फट खाना लगाओ।
मैं अम्मी सें मिल कर आता हूं।

रात का खाना सब मिल कर खाते थे।
ख़ाने के बाद वह चाय बनाने लगी। चाय
देकर वह अपने कमरे में आई। अभी सायम के कपड़े प्रेस करने थे।

वह कपडे प्रेस कर रही थी की सायम
आ गया और उसे गुदगुदी करने लगा।

“उफ़! क्या कर रहे हैं? मुझे कपड़े प्रेस
करने दें। “ठीक है जल्दी करो। तुम्हारे बिना नींद आती। ” सायम शोखी से बोला।

“आती हूं। दो तीन कपड़े रह गए हैं।

∎∎∎

“आराम से नाश्ता करें । हवा के घोड़े
पर क्यो सवार हैं।”वह सायम को जल्द
बाजी से नाएता करते देख कर बोली।

हां हां बेटा! नाएता तो आराम से किया करो ।” अम्मी ने भी उसे टोका।

“अम्मी! लेट हो जाऊंगा ।” कह कर
सायम खडा हो गया

आयला उसे बाहर छोड़ने आई तो
बोली- “आज जारा आ रही है । जल्दी आ
जाइएगा।”

“जो हुक्म सरकार का।” वह मुस्कुराया।

“जी नहीं हुक्म नहीं, गुजारिश है । आप
कहें तो आज अम्मी की तरफ चली जाऊं दो
तीन दिन के लिए। अम्मी काफी दिनों से कह
रही हैं।

“ठीक है, मैं कल दफ्तर जाते हुए तुम्हें
वहां ड्राप कर दूंगा वापसी पर ले आऊंगा।
बस इससे ज्यादा नहीं।

“यह क्या बात हुई। चलिए दो दिन
के लिए छोड़ दें।”

“नहीं, बस शाम तक।” कह कर
सायम चला गया।

आयला झुँझला गई- आमना कहती
है आपा का दिल नहीं चाहता यहाँ आने को।
अब उसे क्या बताऊं मेरे मियां को इतनी
जुदाई बर्दाश नहीं है । वैसे मैं खुद भी सायम
के बिना कहाँ रह सकती हूं ।” वह सोच कर
मुस्कुरा दी।

∎∎∎

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